मध्यप्रदेश इस गर्मियों में असामान्य उच्च तापमान से जूझ रहा है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 18 मई 2026 को राज्य में कई क्षेत्रों में पारा 45–47°C के पार पहुंच गया था। रिपोर्ट के मुताबिक 19 मई को छतरपुर जिले के खजुराहो में अधिकतम तापमान 46.8°C दर्ज किया गया, जो शहर के इतिहास का दूसरा सबसे उच्च तापमान है।
उसी दिन छतरपुर के नौगांव में 46.0°C और कई जिलों (भिण्ड, दतिया, निवाड़ी, टिकमगढ़) में 45°C के आसपास दर्ज किया गया। आगामी दिनों में पारा 2–3°C और बढ़ने की चेतावनी है, जिससे पूरे राज्य में असामान्य गर्मी और “हीटवेव” की स्थिति बनी हुई है।
| क्रमांक | जिला | अधिकतम तापमान (°C) | स्थिति | जल संकट की प्रमुख स्थिति |
| 1 | सीहोर | 43°C – 44°C (अनुमानित) | गर्म | कई गांवों में कुएं सूख रहे हैं, लोग गंदा पानी निकालने को मजबूर |
| 2 | मंदसौर | 44°C – 45°C | गर्म / हीट वेव प्रभाव | नलों से गंदा और बदबूदार पानी, स्वास्थ्य खतरा बढ़ा |
| 3 | बैतूल | 42°C – 43°C | गर्म | ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों लोग पानी की कमी से प्रभावित |
| 4 | रायसेन | 43°C – 44°C | गर्म | हैंडपंप और कुओं पर भीड़, जल विवाद की स्थिति |
| 5 | खरगोन | 46.8°C | हीट वेव | अत्यधिक गर्मी और गंभीर जल संकट |
| 6 | खंडवा | 47.2°C | हीट वेव | ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट गहराया |
| 7 | भोपाल | 44.6°C | गर्म | पानी की मांग बढ़ी, जलापूर्ति पर दबाव |
| 8 | इंदौर | 44.2°C | गर्म | शहरी क्षेत्रों में पानी की खपत बढ़ी |
| 9 | पन्ना | 42°C – 43°C | गर्म | जल स्रोत सूखने से ग्रामीण आबादी प्रभावित |
| 10 | सतना | 45°C के आसपास | गर्म / हीट वेव प्रभाव | गांवों में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी |
भीषण गर्मी का सीधा असर अब जल संकट के रूप में भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है। तापमान बढ़ने के साथ जल निकासी तेज हो जाती है, नदी-तालाब सूखने लगते हैं और भूमि जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है। मध्यप्रदेश की अधिकांश आबादी पीने के पानी के लिए भूमिगत जल पर निर्भर है। ऐसे में जब प्रदेश में पारा लगातार बढ़ता है और मानसूनी वर्षा कमजोर रहती है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब और छोटी जल परियोजनाएँ सूखने लगती हैं।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश के अनेक हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। हाल के वर्षों में सामान्य से कम वर्षा होने के कारण जल संचयन प्रभावित हुआ है और जमीन में पानी का पुनर्भरण घटा है। प्रदेश का बड़ा हिस्सा वन और कृषि आधारित क्षेत्र होने के कारण जलभरण में कमी का असर सीधे खेती और पेयजल दोनों पर पड़ रहा है। इससे सिंचाई संकट के साथ ग्रामीण जल आपूर्ति की समस्या भी गहराती जा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में जल संकट से जुड़ी खबरों में लगातार वृद्धि हुई है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ तालाबों और अस्थायी जल स्रोतों से बाल्टियों में पानी भरती दिखाई दी हैं, जबकि कई स्थानों पर ग्रामीणों को जमीन में गड्ढे खोदकर पानी निकालना पड़ रहा है। भीषण गर्मी के कारण कुएँ सूख गए हैं और नहरों का बहाव कम हो गया है। सीहोर, हरदा सहित कई जिलों में महिलाओं को पानी लाने के लिए घरों से कई किलोमीटर दूर तक जाना पड़ रहा है।

यह संकट केवल मौजूदा गर्मी तक सीमित नहीं माना जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की “डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट 2024” रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में भूजल का दोहन लगातार बढ़ रहा है, विशेषकर मालवा और पश्चिमी क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर बताई गई है। कई जिलों में भूजल उपयोग सुरक्षित सीमा के करीब या उससे ऊपर पहुँच चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून और भूमिगत जल पर बढ़ती निर्भरता आने वाले वर्षों में जल संकट को और गंभीर बना सकती है।
सरकार ने जल संकट से निपटने कई कदम उठाए हैं। केंद्र सरकार की हर घर नल से जल (जल जीवन मिशन) योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में नल के कनेक्शन बढ़ाए गए हैं। दिसंबर 2025 तक देश के 81.3% ग्रामीण घरों में नल कनेक्शन हो चुके थे, और मध्यप्रदेश में भी लाखों परिवारों को शुद्ध पेयजल पहुंचाया जा रहा है । इसके अंतर्गत कटनी जिले जैसे स्थानों में फ्लोराइड-मुक्त जल उपलब्ध कराकर सभी घरों को सुरक्षित पीने का पानी दिया जा चुका है।
गर्मी के मौजूदा दौर में प्रशासन ने आपातकालीन उपाय अपनाए हैं:
दीर्घकाल में जल संकट को कम करने के लिए विशेषज्ञ कई उपाय सुझाते हैं:
मध्यप्रदेश को आवश्यक है कि गर्मी से पहले जल संकट की तैयारी की जाए। जल संकट (Day Zero) की आशंका को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनानी होगी।
सरकार और समाज दोनों को मिलकर निम्न बिंदुओं पर काम करना चाहिए:
मध्यप्रदेश में बढ़ती गर्मी और जल संकट को देखते हुए लंबे समय की मजबूत तैयारी जरूरी है। फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता ग्रामीण इलाकों तक तुरंत पानी पहुँचाने और हर घर तक नल से जल सुविधा बढ़ाने की है। लेकिन भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए पानी बचाने, वर्षा जल संग्रह, पुनर्चक्रण और नई तकनीकों पर गंभीरता से काम करना होगा, ताकि आने वाले वर्षों में गर्मी और जल संकट का असर कम किया जा सके।
नोट: यह ब्रीफ केवल सामान्य जानकारी और जन-जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
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